Thursday, February 13, 2014

क्या हैं आंसू ?

किसी के इंतजार में बहे आंसू
किसी के मिलने से छलके आंसू
किसी के बिछुड़ने पर गिरे आंसू
दरकते रिश्तों को संभालते हैं आंसू
किसी की कमजोरी हैं आंसू
किसी के लिए ताकत हैं आंसू

मां के जज्बात हैं आंसू
पिता का आर्शीवाद हैं आंसू
बहन की उम्मीद हैं आंसू
भाई का प्यार हैं आंसू

किसी की खुशी हैं आंसू
किसी का दर्द हैं आंसू
किसी के दिल को तोड़ते हैं आंसू
किसी को हिम्मत दिलाते हैं आंसू

नौनिहाल के लिए उमंग हैं आंसू
प्रेमी के लिए जंजीर हैं आंसू
अमीर के लिए पैसा हैं आंसू
गरीब के लिए रोटी हैं आंसू
किसी की शुरूआत हैं आंसू
किसी का अंत हैं आंसू

Wednesday, February 15, 2012

सोनिया गांधी रोईं थीं....


इटली वाली सोनिया गांधी रोती भी हैं, ये बताया अपने देश के परिपक्क और खांटी नेता, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने...चुनावी मौसम में खुर्शीद साहब यूपी के आजमगढ़ में थे, एक सभा में मुसलमान भाइयों के बीच भाषण कर रहे थे, दूसरे राजनीतिक दलों से अपने को अलग दिखाने की मिसालें गिना रहे थे, तालियां भी बज रही थीं...ये देख हमारे नेता जी भी रौ में बह गए...और उखाड़ लाए वही पुराना मसला 'बटला हाउस'...वोट पाने के लिए केंद्र में उनकी सरकार ने क्या-क्या काम किये वो तो उन्होने नहीं गिनाये, लेकिन सहानभूति के वोट पाने के लिए 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के बटला हाउस में हुई मुठभे़ड़ का जिक्र छेड़ दिया...और कहा कि मुठभेड़ के दृश्य देखने के बाद सोनिया गांधी रोईं थी, जिसके बाद उन्होने इस मसले को वजीरेआज़म के पास उठाने की सलाह दी थी...अब श्रीमान सलमान साहब आप प्रतिष्ठित वकिल होने के साथ देश के कानून मंत्री भी हैं, जाहिर है आपसे बेहतर कानून जानने वाले कम ही लोग होंगे...तो ऐसे में आप एनएचआरसी की उस रिपोर्ट को क्यों भूल गए जो उसने कोर्ट में पेश कर कहा था कि ''पुलिस टीम को जब जान का खतरा हुआ तो उन्होंने ऐक्शन लिया और यह कहीं से भी मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है" रिपोर्ट में कहा गया था कि शहीद पुलिस इंस्पेक्टर एस सी शर्मा और कांस्टेबल बलवंत सिंह पर जब हथियारों से लैस आतिफ अमीन और साजिद ने गोलियां चलाई थी तो उसके जवाब में इन लोगों को गोली चलाने पर मजबूर होना पड़ा...सिर्फ यही नहीं आईपीसी की धारा-100 भी कहती है कि अगर पुलिस टीम को जान का खतरा है या फिर उसे चोट पहुंचाई जा रही है जिससे उसकी जान जा सकती है तो उसे भी अपनी आत्मरक्षा का अधिकार है...इतना ही नहीं दिल्ली पुलिस जिसके अधीन आती है वो है गृहमंत्रालय...और पी चिदंबरम हैं इसके मुखिया...वो भी कह चुके हैं कि पुलिस मुठभेड़ में आतंकी मारे गए, आम लोग नहीं...बावजूद ऐसे मुद्दों को हवा देना कहां की समझदारी है जनाब सलमान साहब...
डिब्बी राजा उर्फ दिग्विजय सिंह ऐसे अकेले और पहले कांग्रेसी थे जिन्होने इस मुठभेड़ पर सवाल उठाये थे...अब एक जमाने में ''सिमी'' के एडवोकेट रह चुके सलमान खुर्शीद साहब भी इसी राह पर हैं...यही नहीं उन्होने तो उनसे एक कदम आगे जाकर सोनिया गांधी को भी लपेट कर अपनी बात पर मुहर लगा ली...हांलाकि इस बात पर चर्चा कम हुई की मुठभेड़ असली थी या नहीं...चर्चा इस बात पर ज्यादा है कि सोनिया रोईं थी की नहीं...क्योंकि जो मैडम सोनिया के नजदीक रहता है वो ही इसका खुलासा कर सकता है इसलिए जहां सलमान साहब ने मैडम को रोने वाला बताया वही डिब्बी राजा उर्फ दिग्विजय सिंह ने कहा कि वो नहीं रोई थी...ये हाल उस पार्टी का है जिसकी नेता मैडम सोनिया हैं...ये हाल उन नेताओं का है जो अपने को पार्टी का वफादार बताते हैं...ये हाल उनका है जो इस जुगत में रहते हैं कि कौन मैडम सोनिया के ज्यादा करीब है...ये हाल उन इंसानों का है जो अपने हितों को साधने के लिए आगे बढ़ने की बात छोड़....इंसानों को इसानों से लड़ाने की कोशिश में रहते हैं...

Sunday, December 25, 2011

देख तमाशा फोटो का


अन्ना की फोटो संघ के नेता नानाजी देशमुख के साथ एक अखबार में छपी तो कांग्रेसियों की तो बाछें खिल गई...सबसे पहले फिरकापरस्त, माफ करें कांग्रेस के सेवक राशिद अल्वी मांगने लगे अन्ना से संघ के साथ रिश्तों पर जवाब...राशिद साहब फिलहाल तो राज्यसभा में हैं और कांग्रेस पार्टी के वफादार कहलाते हैं...अगर ज्यादा याद दिलायें तो ये वही हैं जो पहले मायावती को बहन जी कहते थे, अब सोनिया को मैडम...अक्सर ये अपने को जनता से जुडा़ बताते हैं, लेकिन इन महारथी से कोई पूछे कि चुनाव हारने भर से कैसे पाला बदल लिया जाता है ? चलिए जवाब देना है या नहीं इन्ही पर छोड़ देते हैं...
अब बात अपने संत डिब्बी राजा यानी दिग्विजय सिंह की भी कर लेते हैं...सर्द सुबह जब वो उठे होंगे तो अखबार में अन्ना और नानाजी देशमुख की फोटो और खबर देख कलेजे में बड़ी ठंडक पहुंची होगी...सो भला वो भी पीछे कहां रहने वाले थे लगे हाथ फिर अलाप लिया वही पुराना राग संघ और अन्ना का...लेकिन जैसे ही किरण देवी ने दिग्विजय की फोटो नानाजी देशमुख के साथ ट्विटर पर पेश की तो वो पानी भरते नज़र आए...लेकिन अब इन संत डिब्बी राजा यानी दिग्विजय सिंह से कोई पूछे कि क्या वो उस फोटो में नानाजी देशमुख का हालचाल जान रहे हैं...चलिए जवाब देना है या नहीं इन्ही पर छोड़ देते हैं...
अब बात उनकी जिन्होने फोटो छापी...वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की...जो नई दुनिया के संपादक हैं, जिनके अखबार ने ये फोटो छापी है...अब ये वरिष्ठ कांग्रेसी पत्रकार हैं...इसलिए नहीं क्योंकि ये अन्ना के विरोधी है...बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जब भी मीडिया मैनजमेंट की जरूरत होती है तो अक्सर वो इनको सबसे पहले याद करते हैं इसलिए इनका धर्म है वफादारी निभाना...अपने काम से नहीं बल्कि अपने को मिलने वाले सम्मान से...अक्सर टीवी पर या अपने यार दोस्तों के बीच आपने इनको कहते सुना होगा कि ये निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर जोर देते हैं...अब इनसे कोई पूछे कि जब ये एक फोटो अपने अखबार में छाप रहे थे तो दूसरी फोटो (दिग्विजय और नानाजी देशमुख) इनको क्यों नहीं दिखी ? वाह रे निष्पक्षता...
फोटो का सहारा लेकर जिस तरह तमाशा बनाया गया वो जरा लिखने वाले और देखने वाले पहले थोड़ी पड़ताल कर लेते...दरअसल जिस कार्यक्रम की वो तस्वीर है वो आरएसएस का दो दिन का एक कार्यक्रम था जिसमें भाग लेने के लिए अन्ना उसमें शामिल हुए थे...बात अगर नानाजी देशमुख की करें तो वो खुद समाज सेवक रहे... खासतौर से शिक्षा के क्षेत्र में...सरस्वती शिशु मंदिर उन्ही के दिमाग की उपज थी...ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान करने वाले से अगर कोई मुलाकात करे तो क्या जुर्म है...क्योंकि वो आरएसएस से जुड़ा है सिर्फ इसलिए....तब तो कांग्रेसी भी जिसमें सोनिया, राहुल और मनमोहन शामिल हैं वो भी आरएसएस से ताल्लुक रखते हैं क्योंकि हमारी संसद में कई सांसद आरएसएस से जुड़े हैं जिनसे सिर्फ आम कांग्रेसी ही नहीं सोनिया, राहुल और मनमोहन अक्सर मिलते जुलते हैं...कई कांग्रेसी तो उनके साथ चाय कॉफी ही नहीं खाना पीना तक साथ करते हैं...अन्ना से सफाई मांगने वाले जरा उन फोटो को भी देखें जिसमें कांग्रेस के नेता बलराम जाखड़, समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और ऐसे ही कई नाम नानाजी देशमुख के साथ दिखाई दे रहे हैं तो क्या ये सभी आरएसएस के हो गए...नहीं....ये सिर्फ एक फोटो पर तमाशा है...लोकपाल से ध्यान हटाने के लिए...

Tuesday, December 6, 2011

थप्पड़ की गूंज

थप्पड़ की गूंज कितनी गहरी होती है इससे आम इंसान अच्छी तरह वाकिफ है, क्योंकि मंहगाई के नाम पर आये दिन मिलने वाले आश्वासन किसी थप्पड़ से कम नहीं हैं...लेकिन एक माननीय मंत्री को अस्ल में थप्पड़ क्या लगा, सभी नेता दलगत भावना से ऊपर उठकर इस गूंज को महसूस करने लगे...हमारे निर्वाचित नेताओं ने तो इसे लोकतंत्र पर हमला मान लिया...लेकिन इस थप्पड़ के लिए किसने मजबूर किया ये बताने वाला कोई नेता आगे नहीं आया...या फिर किसी नेता में इतना दम नहीं था...खैर जो भी हो उस दिन ऐसा लग रहा था कि जैसे एक नेता का स्वर दूसरे नेता के स्वर से हूबहू मेल खा रहा हो...दिखने में भले नेताओं में जोश हो, लेकिन शब्दों का चयन ऐसा था कि वो किसी को श्रद्धांजली दे रहे हों...इस दौरान सभी नेता दुहाई देने लगे कि उनको किसानों ने, मजदूरों ने, आम लोगों ने चुन कर भेजा है इसलिए उनको कैसे कोई थप्पड़ मार सकता है...आम लोगों के समर्थन का गुमान भरने वाले और देश को चलाने वाले एक मंत्री ने अपनी कार्यशैली पर नहीं बल्कि लोगों पर ही उंगली उठा दी...उनका कहना था कि ''पता नहीं देश कहां जा रहा है''...अब इन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि वो तब कौन सी संसदीय परंपरा निभाते हैं जब किसानों को अपनी मेहनत से पैदा किए गेहूं के सही दाम पाने के लिए या कर्जे में राहत लेने के लिए...सड़क पर आना पड़ता है...पुलिस की गोली लाठी खानी पड़ती है...तब कोई नेता इसे लोकतंत्र पर हमला क्यों नहीं बताता...उसके खिलाफ वाकई में आवाज या आंदोलन क्यों नहीं करता....केंद्र या कोई राज्य सरकार तब क्यों आंखें मूंद लेती है क्यों वो सिर्फ मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेती है...और विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध क्यों करता रह जाता है...क्या नेता को लगा थप्पड़ और किसान को लगी गोली में कोई फर्क नहीं है...हां फर्क है....गोली से किसान की जान जाती है और नेता की थप्पड़ से इज्जत...और नेताओं की नजर में जान से ज्यादा कीमत इज्जत की होती है...तभी तो 9 दिन संसद भले ना चली हो...लेकिन हमारे माननीयों ने थप्पड़ पर चर्चा करने का वक्त इसमें से भी निकाल लिया...और जनता से जुड़े विधेयक और अहम् मुद्दे लटके रह गए...जिनकी अहमियत नेताओं की नजर में थप्पड़ से कम थी...

Saturday, November 5, 2011

GET WELL SOON 'डिब्बी राजा'


एक हैं संत...नाम है उनका डिब्बी राजा...दस साल राज किया था उन्होने एक राज्य में...कहते हैं उनके जमाने में सड़कें, सरक जाया करती थी...बिजली की मांग इतनी ज्यादा हो गई थी कि वो पानी मांगती थी, लेकिन सत्ता से वो क्या गए...सड़क ने सरकना बंद कर दिया...रही बात बिजली-पानी की तो वो भी लाइन पर आ गए...लिहाजा डिब्बी राजा के पास कुछ काम बचा नहीं इसलिए अब वो संत बन गए और अब वो ट्विट करते हैं...प्रवचन देते हैं...जरूरत पड़ने पर सलाह देने से भी गुरेज नहीं करते...लोग कहते हैं कि वो कांग्रेसी हैं लेकिन पार्टी कई बार उनके बयानों से...उनके किए ट्विट से ही किनारा कर लेती है...इसलिए कुछ लोग उनको एक्सपायरी डिब्बी भी कहने लगे हैं...अब डिब्बी राजा, तो राजा हैं...ऐसे में एक्सपायरी होने के बाद भी अपना असर तो छोड़ेंगे ही...इसलिए वो नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं और निशाने पर उन्ही लोगों को ले रहे हैं जिनको वो अपना आदर्श...अन्ना हजारे और गुरू...रामदेव को मानते थे...तभी तो अपने आदर्श अन्ना हजारे के बारे में वो कहते थे कि मेरे मन में उनके लिए इतना सम्मान है कि कल भी मैं उनके पैर छूता था और आज भी मुलाकात होगी तो पैर छूऊंगा...तो कभी गुरू रामदेव को अन्ना से ज्यादा ईमानदार बताते हैं...अस्ल में एक ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंक रखा है...तो दूसरे ने कालेधन के खिलाफ...और डिब्बी राजा...जिसको अपनी पार्टी बताते हैं वो भ्रष्टाचार और कालेधन से अपना कोई सरोकार नहीं मानती...बल्कि उसका स्लोगन ही यही है ''कांग्रेस का हाथ, महंगाई के साथ"...तभी तो उनकी पार्टी के मंत्री महंगाई के लिए कभी त्योहारों को कोसते हैं, तो कभी लोगों को डराते हैं कि महंगाई अभी और बढ़ेगी...ऐसे में भ्रष्टाचार और कालेधन से जनता का ध्यान ना भटकाया जाए...लेकिन चिंतन का ठेका ले लिया है संत डिब्बी राजा ने...अपने को एक्सपायरी से बचाने के लिए अपने आदर्श अन्ना हजारे को वो ट्विट कर उनको ट्यूबलाइट करार देते हैं तो अपने गुरू रामदेव को ठग...डिब्बी राजा जानते हैं कि कागज में खिंची किसी लाइन को छोटा करने के लिए उसके साथ एक दूसरी बड़ी लाइन खींच दो तो वो लाइन अपने आप छोटी हो जाएगी...इसलिए उन्होने अपने आदर्श और गुरू के समांनतर लाइन खींचने का फैसला लिया...तभी तो अन्ना और रामदेव के किसी बयान पर पार्टी का जवाब आने से पहले अपना बाण छोड़ देना उनकी फितरत में शामिल हो गया है...अब कांग्रेस भी क्या करे उनका नीजि बयान बताकर वो भी पल्ला झाड़ लेती है...दरअस्ल डिब्बी राजा को सबसे ज्यादा खुन्नश है राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से, जिसकी वजह से उन्हे सत्ता का बलिदान करना पड़ा...इतने बड़े त्याग के बाद डिब्बी राजा की नजर में आरएसएस आतंकवादी संगठन बन गया...और हर हिन्दू आतंकवादी...डिब्बी राजा ने जिसे अपना विरोधी माना और उसने कोई बयान दिया नहीं कि वो आरएसएस का आतंकवादी हो गया...दरअस्ल डिब्बी राजा एक खास तबके पर ध्यान लगाये हुए हैं...आखिर वो राजनीतिज्ञ जो हैं...जिस प्रदेश के वो अपनी पार्टी के प्रभारी हैं वहां पर खास तबके की जमात करीब १९ प्रतिशत है...डिब्बी राजा ने भले ही 10 साल राज किया हो...लेकिन करीब इतने ही सालों से वो उस राज्य से बाहर हैं...इसलिए वो मन में कुछ हसरत पाले हुए हैं...लेकिन संत हैं इसलिए जाहिर भी नहीं कर सकते...बड़ी दुविधा में हैं वो...तो आइए हम भगवान से कामना करें की संत डिब्बी राजा का दिल साफ हो...आलोचनाओं का वो संत की तरह सामना करें और उनकी वाणी से ये ना लगे की वो बीमार हैं...GET WELL SOON दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा उर्फ डिब्बी राजा

Monday, September 19, 2011

आओ खेलें ब्लॉग-ब्लॉग...

चेतावनी : ये भले ही वैधानिक ना हो लेकिन भावनात्मक हैं...इसलिए इस चेतावनी को गंभीरता से लें. आगे आप जो पढ़ें उसे मनोरंजन की दृष्टि से पढ़े. व्यर्थ में किसी शब्द या वाक्य का अर्थ ना निकाले...उसे अनर्थ होने की प्रबल संभावना है जिसके लिए ब्लॉगर किसी भी दृष्टि से जिम्मेदार नहीं होगा. अपनी सोच के लिए आप खुद जिम्मेदार होंगे...जिसके बाद ब्लॉगर की ओर से कार्रवाई संभव है...

भला चेतावनी देकर कोई ब्लॉग लिखता है...ये फलसफा भले अटपटा लगे...लेकिन जरूरी था...क्योंकि आगे जिन पात्रों का जिक्र है वो सभी भले ही काल्पनिक हों लेकिन सभी बुद्धिजीवी वर्ग से आते हैं...यानी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 'पत्रकार'...पत्रकार का काम होता है बाल की खाल निकालना...लेकिन आजकल मौसम है 'खरबूजे' का...चौकियें मत...अस्ल में खरबूजे की पहचान होती है रंग बदलने से...कुछ यही हाल मेरे जानने वाले कुछ दैदिप्यमान, बुद्धिजीवी और वरिष्ठ पत्रकार भाईयों के साथ हो रहा है और उस असर से अब मैं भी अछूता नहीं रहा...यानी आप उनको भले ही खरबूजा ना कहें...मुझे आप कह सकते हैं...लेकिन मैं खरबूजा कैसे बना...वो कहानी मैं आपके सामने बयां कर रहा हूं...

हमारे बीच सबसे पहले खरबूजे का बीज डाला था...आधुनिक तकनीक के ज्ञाता..मेरे खास दोस्त रवीश ने...क्योंकि वो महारथी हैं किसी भी अत्याधुनिक कंप्यूटर, मोबाइल, जैसे गैजेट को चलाने में...उससे जुड़ा ज्ञान रखने में...मुझे तो कई बार शक होता है कि कंपनियां बाजार में अपना कोई उत्पाद उतारने से पहले एक बार जरूर उनसे जानकारी लेती होगी...उनका ये बड़प्पन ही है कि उन्होने आज तक इस राज को छुपा कर रखा...उनके इसी ज्ञान के अथाह सागर का सबसे पहले लाभ उठाया मेरे वरिष्ठ और सम्मानित सहयोगी ब्रजेंद्र जी ने...शुरूआत में कंप्यूटर से लगभग अंजान थे...अभी 6 महीने ही हुए हैं बीज डाले...लेकिन अब ब्लॉग, फैसबुक और तमाम ऐसी सोशल नेटवर्किंग साइट वो चुटकियों में चलाते हैं..इन साइटों पर उनका इतना दबदबा हो गया है कि उनके फॉलोअर की संख्या हजारों में पहुंचने वाली है और उनमें भी कई नामचीन हस्तियां हैं...उनका ये पेड़ सही तरीके से फले फूले इसके लिए समय-समय रवीश उसमें खाद डालने में मदद करते हैं...ब्रजेंद्र जी की लगन देखिये...उनको अपने आसपास जो दिखा झट से उससे दो मिनट का वक्त मांग कर अपने पेड़ में लग रहे फलों की जानकारी दे दी...हालांकि कुछ लोगों को इससे कोफ्त भी होती है...लेकिन मन ही मन वो भी चाहते हैं कि काश ऐसा ही एक पेड़ वो भी लगाते और इसी इच्छा में देर से ही सही...खरबूजे के बीज अब वो भी डालने लगे हैं...बहुत से साथी तो मझधार में हैं...खरबूजे के बीज डालने की हसरत पाले बैठे हैं...लेकिन वो नहीं जानते की ये बीज कैसे डलेगा...और किसी से पूछ लिया तो नाक कट जाएगी...भले ही ब्रजेंद्र जी का ब्लाग रूपी खरबूजे का पेड़ कैसा भी हो...लेकिन तारीफ हर कोई करता है कि वो बुरा ना मान लें...ऐसी ही तारीफ करते करते बीज डाल बैठी मेरी सहयोगी शाहीन...बड़े जोश से बीज डाला था उन्होने...अपने पेड़ के नामकरण के लिए बस उन्होने विज्ञापन का सहारा नहीं लिया...बाकि सब कुछ कर दिया था...लोगों के बीच जनमत तक कराया और पौधा जब तक पेड़ बनता उनकी तो हिम्मत ही जवाब दे गई...बमुश्किल एक ही फल आया है उनके पेड़ में...हांलाकि इस मामले में मेरा ब्लाग रूपी खरबूजे का रिकार्ड उनसे बुरा है दिसंबर 2009 में पहला फल आया था लेकिन उचित देखभाल और खाद ना डालने की वजह से सिंतबर 2011 में दूसरा खरबूजा अब आ रहा है...शाहीन कहती हैं कि वक्त नहीं मिलता...लेकिन क्या हुआ...मेरे एक और सहयोगी हैं साहिल उनके पास तो वक्त ही वक्त है...इतना कि बेवक्त में भी वक्त में रहते हैं...और उनकी ख्वाहिश रहती है कि शाहीन से वो कभी भी पीछे ना रहें...बस यही कुंठा उनके मन में घर कर गई और जब शाहीन अपने पेड़ के नामकरण के लिए जनमत करा रही थी तभी साहिल ने मन में फैसला ले लिया था कि वो भी एक पेड़ लगाएंगे और ऐसा लगाएंगे कि एक ही पेड़ में दो फलों का मजा आए...और वो फल होगें खरबूजा और दूसरा तरबूजा...तभी तो सभी लोग हिंदी में ब्लॉग लिख रहे थे लेकिन उन्होने 24 घंटे के भीतर अंग्रेजी में दो ब्लॉग ठोक डाले...और अपने पेड़ को कैसे प्रसिद्ध किया जाता है इसके लिए ब्रजेंद्र जी के तरीके की मदद ली...अपना हो या पराया हर किसी को पकड़ पकड़ कर कहने लगे की आप मेरा ब्लॉग पढ़ें और अगर ना भी पढ़ें तो कमेंट जरूर करियेगा...इससे उत्साह बढ़ेगा...मुझे भी उनका ब्लॉग पढ़ने का मौका मिला...अच्छा था...इतना अच्छा कि मेरा मन भी करने लगा कि क्यों ना मैं एक और खरबूजा लगाऊं और इसी चाहत में मैंने ये खरबूजा बना डाला...और ब्लॉग ब्लॉग लिखने का ये खेल कब खरबूजा बन गया मुझे भी पता नहीं चला...

Friday, December 11, 2009

शार्टकट यानी तेलंगाना

एक फिल्म का गाना है ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश का यारों क्या कहना...वाकई में हिन्दुस्तान...'सारे जहां से अच्छा है'...याद हैं न राकेश शर्मा की ये बात, जो अंतरिक्ष से उन्होने इंदिरा गांधी को कही थी...उनकी ये बात करीब तीन दशक बाद अब मेरी समझ में आ रही है क्योंकि शायद उन्होने ये बात यहां रहने वाले दिलों के लिए नहीं बल्कि भौगोलिक स्थिति को देखकर कही होगी...क्योंकि जो लोग यहां रहते हैं उन्हे देखकर शायद ये शब्द न निकले...क्योंकि अपना देश सबको प्यारा होता है लेकिन अपने देश में लोगों की वरीयता अब राज्य तक सीमित हो गई है और इसकी ताजा मिसाल है अलग राज्य तेलंगाना की मांग...हम कब इस सोच से बाहर निकलेंगे कि अलग राज्य ही विकास की पहचान होती है...एनडीए के शासन में बने तीन राज्य छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का क्या हाल हुआ...छत्तीसगढ़ नक्सलियों का गढ़ बन गया...झारखंड घोटाले का सिरमौर और उत्तराखंड कर्ज के बोझ में इतना दब गया कि यहां की सरकार ने नई नियुक्तियों पर रोक लगा दी है क्योंकि उसके पास काम चलाने लायक पैसा भी नहीं है...ये तो इन राज्यों के विकास की एक झलक है फिर ऐसे नए राज्यों का क्या फायदा...जहां लोगों के पास नौकरियां...किसानों के पास जमीन नहीं...

विकास देश का होता है तो क्या इसमें राज्य शामिल नहीं होता...लेकिन राज्य के साथ ये बात नहीं कही जा सकती...क्योंकि ये देश के एक हिस्से का ही विकास भर है...इसलिए ये सोच होनी चाहिए कि देश के विकास में ही राज्य का विकास है...तो ऐसे में अलग राज्य की मांग कितनी सही है...अगर ये सही है तो देश के और टुकड़े भी होने चाहिए...क्योंकि अलग राज्य की मांग आंध्र में ही नहीं बल्कि दूसरी जगहों से भी उठ रही है...जब देश टुकड़ों में बंट जाएगा तो बिखरेगा या फिर एक बंद मुठ्ठी बनकर उभरेगा...ये फैसला करना है युवाओं को...कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा देश देना चाह रहे हैं...क्योंकि आज के नेता अस्ल में राजनेता बन गए हैं...तभी तो हर मुद्दे पर वो राजनीति से बाज नहीं आते...उनके लिए ये जरूरी नहीं कि कोई फैसला देश के लिए कितना फायदेमंद या नुकसान देह है...उनकी नजर सिर्फ सीमित दायरे तक रहती है यानी राज्य में अपनी सत्ता बनाए रखने या उसे हासिल करने के लिए वोटबैंक पर...लेकिन अगर यही राजनेता देश के बारे में जरा भी सोचें तो क्या राज ठाकरे...चंद्रशेखर राव जैसे छुटभैय्ये नेताओं की दुकान चल पाएगी...मैं तो कहूंगा तब ये दुकान नहीं मॉल चलाएंगे...क्योंकि इनकी पहचान राज्य से नहीं देश से होगी...फिर इनको तय नहीं करना पड़ेगा कि कौन किस प्रदेश का है किस रंग या जाति का है और ऐसे में इनकी पहचान क्षेत्रिय न होकर असली नेता की बनेगी...वोट पाने के लिए राज ठाकरे जैसे नेताओं को सिर्फ मराठी वोट बैंक पाने की चिंता नहीं रहेगी...तब उनको बिहारी क्या पंजाबी भी अपना नेता मानेगा...चंद्रशेखर तेलंगाना कि चिंता छोड़ देश की चिंता करें तो उसमें तेलंगाना जैसे छोटे प्रदेश का ही नहीं पूरे आंध्र का भला है...

दुनिया मंदी और पर्यावरण जैसे बड़े मुद्दों पर बहस कर रही और हम अब भी जाति रंग प्रदेश को लेकर आपस में उलझ रहे हैं...ये सिर्फ सोच का फर्क है...जरूरत हमें अपनी सोच को बड़ा करने की...उस सोच में रंग भरने की है...अपने छोटे फायदे को छोड़ दूसरों के लिए कुछ करने की है...ये खुद हमें तय करना है कि हम अपने फायदे की जोड़ तोड़ में रहें या फिर दुनिया को रास्ता दिखाने के लिए आगे आएं...और ये तभी हो सकता है जब हम शार्टकट को छोड़ दें...