एक फिल्म का गाना है ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश का यारों क्या कहना...वाकई में हिन्दुस्तान...'सारे जहां से अच्छा है'...याद हैं न राकेश शर्मा की ये बात, जो अंतरिक्ष से उन्होने इंदिरा गांधी को कही थी...उनकी ये बात करीब तीन दशक बाद अब मेरी समझ में आ रही है क्योंकि शायद उन्होने ये बात यहां रहने वाले दिलों के लिए नहीं बल्कि भौगोलिक स्थिति को देखकर कही होगी...क्योंकि जो लोग यहां रहते हैं उन्हे देखकर शायद ये शब्द न निकले...क्योंकि अपना देश सबको प्यारा होता है लेकिन अपने देश में लोगों की वरीयता अब राज्य तक सीमित हो गई है और इसकी ताजा मिसाल है अलग राज्य तेलंगाना की मांग...हम कब इस सोच से बाहर निकलेंगे कि अलग राज्य ही विकास की पहचान होती है...एनडीए के शासन में बने तीन राज्य छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का क्या हाल हुआ...छत्तीसगढ़ नक्सलियों का गढ़ बन गया...झारखंड घोटाले का सिरमौर और उत्तराखंड कर्ज के बोझ में इतना दब गया कि यहां की सरकार ने नई नियुक्तियों पर रोक लगा दी है क्योंकि उसके पास काम चलाने लायक पैसा भी नहीं है...ये तो इन राज्यों के विकास की एक झलक है फिर ऐसे नए राज्यों का क्या फायदा...जहां लोगों के पास नौकरियां...किसानों के पास जमीन नहीं...
विकास देश का होता है तो क्या इसमें राज्य शामिल नहीं होता...लेकिन राज्य के साथ ये बात नहीं कही जा सकती...क्योंकि ये देश के एक हिस्से का ही विकास भर है...इसलिए ये सोच होनी चाहिए कि देश के विकास में ही राज्य का विकास है...तो ऐसे में अलग राज्य की मांग कितनी सही है...अगर ये सही है तो देश के और टुकड़े भी होने चाहिए...क्योंकि अलग राज्य की मांग आंध्र में ही नहीं बल्कि दूसरी जगहों से भी उठ रही है...जब देश टुकड़ों में बंट जाएगा तो बिखरेगा या फिर एक बंद मुठ्ठी बनकर उभरेगा...ये फैसला करना है युवाओं को...कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा देश देना चाह रहे हैं...क्योंकि आज के नेता अस्ल में राजनेता बन गए हैं...तभी तो हर मुद्दे पर वो राजनीति से बाज नहीं आते...उनके लिए ये जरूरी नहीं कि कोई फैसला देश के लिए कितना फायदेमंद या नुकसान देह है...उनकी नजर सिर्फ सीमित दायरे तक रहती है यानी राज्य में अपनी सत्ता बनाए रखने या उसे हासिल करने के लिए वोटबैंक पर...लेकिन अगर यही राजनेता देश के बारे में जरा भी सोचें तो क्या राज ठाकरे...चंद्रशेखर राव जैसे छुटभैय्ये नेताओं की दुकान चल पाएगी...मैं तो कहूंगा तब ये दुकान नहीं मॉल चलाएंगे...क्योंकि इनकी पहचान राज्य से नहीं देश से होगी...फिर इनको तय नहीं करना पड़ेगा कि कौन किस प्रदेश का है किस रंग या जाति का है और ऐसे में इनकी पहचान क्षेत्रिय न होकर असली नेता की बनेगी...वोट पाने के लिए राज ठाकरे जैसे नेताओं को सिर्फ मराठी वोट बैंक पाने की चिंता नहीं रहेगी...तब उनको बिहारी क्या पंजाबी भी अपना नेता मानेगा...चंद्रशेखर तेलंगाना कि चिंता छोड़ देश की चिंता करें तो उसमें तेलंगाना जैसे छोटे प्रदेश का ही नहीं पूरे आंध्र का भला है...
दुनिया मंदी और पर्यावरण जैसे बड़े मुद्दों पर बहस कर रही और हम अब भी जाति रंग प्रदेश को लेकर आपस में उलझ रहे हैं...ये सिर्फ सोच का फर्क है...जरूरत हमें अपनी सोच को बड़ा करने की...उस सोच में रंग भरने की है...अपने छोटे फायदे को छोड़ दूसरों के लिए कुछ करने की है...ये खुद हमें तय करना है कि हम अपने फायदे की जोड़ तोड़ में रहें या फिर दुनिया को रास्ता दिखाने के लिए आगे आएं...और ये तभी हो सकता है जब हम शार्टकट को छोड़ दें...